भरोसे का नाम बस भगवान

bhagvaan
भगवान तो नाम है भरोसे का.... -

Bhagvaan की परम उपासक सूफी संत रबिया बैठी है.. दो भिखारी आते हैं और रबिया से पूछते हैं खाने को कुछ मिलेगा क्या ?  रबिया कहती है की आ जावो..दो रोटी है मेरे पास ..यह आप खा लेना..भिखारी पूछते हैं आप क्या खावोगे? रबिया ने  आसमान की और देखा और कहा की मेरे तो बीस रोटी की व्यवस्था bhagvaan shiva ने कर दी है.इतने में दो भीखारी और आ जाते हैं और रबिया वो दो रोटी उन भिखारियों को दे देती है..पहले से बैठे भिखारियों को बड़ा आश्चर्य की हमें भी बिठा लिया और पास में जो दो रोटी थी वो भी बाँट दी..इतने में एक महिला आती है और 18 रोटी लाती है..रजिया कहती है देनी है तो  बीस दो नहीं तो जावो…वो भीखारी सोचे की आज तो भूखा ही  जाना पड़ेगा..इतने में वो औरत बीस रोटी लेकर आती है..अब  भिखारियों की जान मे जान आई..खाना खाने के बाद भिखारी बोले की आप और हमारे लिए तो 18 रोटी ही काफी थी. आपने लौटाई क्यों? क्या मालूम आप बीस के पाने की जिद में 18 से हाथ धो बैठते…रबिया बोली यह विश्वास bhagvaan पर है..एक बार नहीं हजारों बार  परखा है bhagvaan को.. मैं जो दूंगी  उसका दस गुना देने का वादा कर रखा है..मैं कम क्यों लूँ..बीस मतलब बीस. ………………………शिशुपाल की सौवीं गलती पर bhagvaan श्री कृष्ण  सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक अलग कर देते हैं.. श्री कृष्ण का तो  शिशुपाल से रक्त संबंध तो था ही और उनका दुःखी होना भी स्वाभाविक था….bhagvaan श्री कृष्ण  का ध्यान भटक गया और  चक्र लौटते समय अंगुली कट जाती है..  Bhagvaan श्री कृष्ण के पास द्रौपदी दौड़ कर आती है और अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्री कृष्ण की अंगुली के बाँध देती है.इसी पल्लू की कीमत जब दुशासन द्रोपदी का चीरहरण करता है तब Bhagvaan श्री कृष्ण एक का लाख कर चुकाते हैं.. साड़ी का छौर इतना बड़ा हो जाता है कि दुशासन अपनी पूरी ताकत लगा देता है मगर जब माधव  ही मान रखे तो किसी की क्या औकात? लोग समझ नहीं पा रहे थे कि साड़ी बीच नारी है कि नारी बीच साड़ी है.. साड़ी की ही नारी है या नारी की ही साड़ी है… लीलाधर Bhagvaan की लीला आप और हम क्या समझें? बहुत बार लोग कहते हैं की अमुक आदमी को उसकी योग्यता से ज्यादा मिला है.. पर वो यह नहीं देखते कि उसके पीछे खूँटा किसका है? भरोसा बहुत ही भारी है चाहे bhagvaan का हो या किसी और का….. हमारा तो विश्वास ही पग पग पर डगमगा जाता है… .

Shiva का एक अनन्य उपासक रात को सो रहा था.. चोर आया घर में.. उपासक अल्हड़ नींद में सोया.. जोर जोर से खराटे भर रहा था.. चोर आराम से मुआयना कर रहा है.. महादेव जिसके आराध्य हो वो तो मस्त ही सोयेगा.. चोर ने जितना एकत्रित करना था उतना कर लिया.. अब जाने को आगे बढ़ा तो Bhagvaanका उपासक की चादर में उलझ पड़ा.. एक बार.. दो बार.. तीन बार.. हर बार खड़ा होता और कोशिश करता बाहर जाने की.. पर हर बार उलझ पड़ा… अब पाँचवी बार कोशिश करने लगा और फिर गिर पड़ा.. इस बार shiva का उपासक जाग गया और बोला बावले! तुम इतना ही समझ नहीं पा रहा है कि मैं मस्त सोया हूँ और मेरी चादर मेरे सोने पर भी तुझे जाने नहीं दे रही.. मेरी चादर तो देवों के देव shiva संभाल रहे हैं.. मुझे क्या चिंता..मेरी चादर का रखवाला तो bhagvaan है.. Shiva है.. … शेखर है.. आशुतोष है..मुझे मेरी क्या चिंता….. मित्रों! यह bhagvaan पर भरोसे का नाम ही जिंदगी है.. चाहे bhagvaan कहो चाहे या lord krishna सब नाम भरोसे के हैं और हम अलग अलग नामों से बुलाते हैं… हर हर महादेव…

मिलने को तो भगवान भी मिलते हैं… मगर

क्यों कहते हैं आत्मा सो परमात्मा

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